मखाना की खेती से बदलेगी किसानों की किस्मत, सरकार दे रही अनुदान और प्रशिक्षण

देश के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक फसलों से हटकर अब किसान नकदी फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में ‘सफेद सोना’ कहे जाने वाले मखाने की खेती पूरे देश में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। खास बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें भी इस खेती को बढ़ावा देने के लिए अनुदान और प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं दे रही हैं। आइए जानते हैं मखाना की खेती से जुड़ी पूरी जानकारी।

मखाना की खेती क्यों है फायदेमंद?

दरअसल, मखाना की खेती किसानों के लिए इसलिए फायदेमंद मानी जाती है क्योंकि इसमें वैल्यू एडिशन की बड़ी संभावना है। अगर किसान केवल कच्चा बीज बेचने के बजाय उसे प्रोसेस करके तैयार मखाना के रूप में बाजार में उतारते हैं तो उन्हें कई गुना अधिक कीमत मिलती है। बीज को सुखाकर, भूनकर और प्रोसेस करने के बाद तैयार मखाना बाजार में 700 से 1000 रुपये प्रति किलो तक बिकता है। विशेषज्ञों के अनुसार 1 किलो बीज से करीब 200 से 250 ग्राम तैयार मखाना निकलता है। यदि किसान खुद पैकेजिंग और ब्रांडिंग भी करते हैं तो मुनाफा और भी अधिक हो सकता है।

सरकार की क्या योजना है?

केंद्र सरकार ने मखाना की खेती को बढ़ावा देने के लिए “सेंट्रल सेक्टर स्कीम फॉर डेवलपमेंट ऑफ मखाना” शुरू की है। इस योजना के तहत देशभर के किसानों को मखाना उत्पादन के लिए आर्थिक अनुदान और तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कई राज्यों को राष्ट्रीय मखाना बोर्ड से जोड़ने की घोषणा की है। सरकार का मुख्य उद्देश्य किसानों को अधिक लाभकारी विकल्प उपलब्ध कराना और उनकी आय में वृद्धि करना है।

किन राज्यों में हो रही है मखाना की खेती?

मखाना की खेती पहले सिर्फ बिहार तक सीमित थी लेकिन अब यह तेजी से दूसरे राज्यों में भी फैल रही है। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में मखाना उत्पादन सबसे ज्यादा होता है और यहां के किसान लंबे समय से इस फसल से अच्छी कमाई कर रहे हैं। अब छत्तीसगढ़ में भी मखाना की खेती शुरू हो गई है। वर्ष 2025-26 से छत्तीसगढ़ में इस योजना का क्रियान्वयन शुरू किया गया है जिसके लिए 178.11 लाख रुपये की स्वीकृति मिली है। धमतरी, बालोद, महासमुंद और गरियाबंद जिलों में तालाबों और कृषि भूमि दोनों पर मखाना उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

महिला स्व-सहायता समूहों की अहम भूमिका

मखाना की खेती में महिला स्व-सहायता समूह भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में शैल पुत्री, नई किरण और जय माँ नव ज्योति जैसे समूहों के माध्यम से उत्पादन किया जा रहा है। जिले में 55 एकड़ क्षेत्र में बुवाई पूरी हो चुकी है और दर्जनों किसान इस पहल से जुड़ चुके हैं। यह इस बात का संकेत है कि मखाना की खेती सिर्फ पुरुष किसानों तक सीमित नहीं है बल्कि महिलाएं भी इससे आत्मनिर्भर बन रही हैं।

मखाना की खेती कैसे करें?

मखाना की खेती के लिए तालाब या जलभराव वाली कृषि भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसकी बुवाई नवंबर से दिसंबर के बीच की जाती है और फसल जुलाई से अगस्त के बीच तैयार हो जाती है। ओजस फार्म की संचालक मनीषा चंद्राकर के अनुसार छत्तीसगढ़ की जलवायु और मिट्टी मखाना के लिए बेहद अनुकूल है। सरकार की ओर से किसानों को आधुनिक तकनीक की ट्रेनिंग भी दी जा रही है ताकि उत्पादन और प्रोसेसिंग दोनों बेहतर हो सकें।

भविष्य की क्या योजना है?

छत्तीसगढ़ सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 2 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार की है। इसके तहत 75 हेक्टेयर तालाब और 30 हेक्टेयर भूमि पर मखाना उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही 10 नए तालाब बनाने और अतिरिक्त क्षेत्र में खेती विस्तार की भी योजना है। इससे साफ है कि आने वाले समय में मखाना की खेती का दायरा और तेजी से बढ़ेगा।

कुल मिलाकर मखाना की खेती किसानों के लिए एक स्थायी और बेहद लाभकारी विकल्प बनकर उभर रही है। सरकार का अनुदान, प्रशिक्षण और बाजार में अच्छी कीमत तीनों मिलकर इस खेती को और आकर्षक बना रहे हैं। जो किसान पारंपरिक फसलों से अच्छी कमाई नहीं कर पा रहे हैं उनके लिए मखाना की खेती एक सुनहरा मौका साबित हो सकती है।

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